Shaayar Kuldip

मेरे शहर का यही नसीब

Posted By on November 30, 2017 in Social | 0 comments

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मेरे शहर का यही नसीब

शहर बड़ा और लोग गरीब
मेरे षहर का यही नसीब

कुछ पेट के तो कुछ दिल के गरीब
धुँध पाप की छाई बेफिकर कर्मों से
कई ईमान के तो कई गरीबों के रकीब
हक माँगों तो जिल्लत जहान की मिले
कुछ इंसानियत के कुछ अक्ल के फकीर

सब दौड़ रहें हैं आगे निकलने के लिए
जो आगे निकला वो रिष्तों का गरीब
जो पीछे रहा उसकी अपनी तकदीर
पैसे के बजार में बिक रही है मुहब्बत
हाथ है खाली राँझे को ना मिली हीर

अमीर गाड़ी से कुचल कर चला गया
गरीब मोबाईल उठा कर निकल गया
वह तड़पता रहा सडक के किनारे
इन्सान बेदिल पास से गुज़र गया
सच मानो इंन्सीनियत हुई लीर लीर
( तार-तार)

 

ये गंदा पानी और गंन्दगी के ढेर
कुछ ऐसे षुरू होती है मेरी सवेर
मौसम की बेरुखी में जाता हूँ ऑफिस
अनचाहे जामों से हो जाती है देर
बात तो बदली ना बदली तस्वीर

वादे बड़े-बड़े मगर काम नहीं है
गुठली तो है पर आम नहीं है
जाओ जहाँ भी चार सू धोखा फरेब है
षुरुआत तो है लेकिन अंजाम नहीं है
अमल हैं छोटे और लंबी जीभ

हो घर या षहर की गलियाँ
कुत्ते व मछर ही काटते हैं
चिकनगुनिया और डेंगू के
वायरस मुफ़्त में बाँटते हैं
लड़ती हैं सरकारें और बेहाल मरीज

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