Shaayar Kuldip

तुझे मनाने की

Posted By on November 30, 2017 in Shikwa | 0 comments

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तुझे मनाने की

क्यूँ छोड़ दूँ राह मयखाने की
तंज कसना आदत है ज़माने की
है ये खुदा के घर जैसा
दुआ कबूल यहाँ हर दिवाने की

मय नहीं ये तो दवा हैं यारो
गमे इष्क से उभर जाने की
जानता हूँ ये हो ना पाएगा
एक कोषिष है उसे भुलाने की

दिल के रिष्ते तड़प के मरते हैं
रज़ा ना हो जब निभाने की
भटकना है अगर अंधेरों में
क्या ज़रूरत है दिए जलाने की

छोड़ना था तो हक से कह देते
ना ज़रूरत थी किसी बहाने की
रुठना अगर अदा है तेरी
हमें भी आदत है तुझे मनाने की

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